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वीरबाला तीलू रौतेली
सत्रहवीं शताब्दी का उत्तराखंड आज से काफी भिन्न राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सैन्य परिस्थितियों वाला क्षेत्र था। कत्यूरी राजा धामशाही ने गढ़वाल एवं कुमाऊँ के सीमांत क्षेत्र खैरागढ़ (कालागढ़ के पास) में अपना आधिपत्य जमाया हुआ था। प्रजा इनके अत्यायारों से त्रस्त थी। गढ़वाल के महाराजा फतेहशाह ने थोकदार भूप सिंह गोरा को इस क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी थी। थोकदार अपने कर्तव्य-पालन के क्रम में स्वयं तथा अपने दोनों पुत्रों के साथ ही अपने भाई के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। तब भूप सिंह की विधवा मैंणावती ने एक बड़ा संकल्प लिया और अपनी एकमात्र जीवित बच्ची किशोरवय पुत्री, तीलू रौतेली, को युद्ध के मैदान में भेज दिया।
तीलू एक वीरांगना की तरह लड़ी तथा सात वर्षों के युद्ध में अपने सभी शत्रुओं को पराजित कर दिया। किंतु विजव-उत्सव के अमोदपूर्ण अवसर पर, 22 वर्ष की युवावस्था में, धोखे और छिपकर किये गए वार में यह वीरांगना भी शहीद हो गई। नाटककार डॉ. उनियाल ने इसी वीरांगना तीलू के शौर्य, साहस और पराक्रम पर वह नाटक लिखकर उसे बृहत्तर भारतीय समाज तक पहुँचाने का प्रशंसनीद कार्य किया है।
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Authors | |
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Binding | Paperback |
ISBN | |
Language | Hindi |
Pages | |
Publishing Year | 2020 |
Pulisher |
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